संत कबीर साहिब
वैष्णव संत आचार्य रामानंद को कबीर जी अपना गुरु बनाना चाहते थे।लेकिन रामानंद जी नीच जाती वाले को पसंद नहीं किया करते थे।उनके मन में एक विचार आया कि स्वामी रामानंद जी सुबह चार बजे गंगा स्नान जाते हैं उसके पहले ही उनके जाने के मार्ग में सीढ़ियों लेट जाऊँगा और उन्होंने ऐसा ही किया। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल 'राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।
जब कबीर जी पाच साल के हो चुके थे तो वह जहाँ कहीं भी सत्संग या पुराणों का पाठ होता रहता था तो वहाँ पहुंच कर उन गुरुऔ को बताया करते थे कि "आप जो ज्ञान बता रहे हो वह सब उलटा बता रहे हो ओर शास्त्रौ मे ऐसा नहीं लिखा है"तब वह गुरू उनको मारने दोडते ओर कहते कि "यह तो बालक है ओर अनपढ हैं इसे क्या पता शास्त्रौ मे क्या लिखा है।और एक दिन ऐसे ही कबीर जी रामानंद जी के शिष्य जो सत्संग कर रहा था वहाँ पहुंच कर शास्त्रौ के बारे में बताने लगे कि "आप गलत बता रहे हो शास्त्र में ऐसा नहीं लिखा है आप जनता को भ्रमित कर रहे हो।तो वह शिष्य रामानंद जी के पास जाकर कहा कि "गुरुदेव एक पाच साल का बालक है ओर हमें तथा शास्त्रौ को गलत बताता है ओर कहता है आप जनता को भ्रमित कर रहे हो ओर गलत ज्ञान बता रहे हो। और वह आपसे नामदीक्षा ले रखा है"तब रामानंद जी ने उस बालक को पकडकर लाने को कहा।फिर........
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